साईंकाका
गुरु परिचय

साईंकाका के बारे में

गुरु परिचय साईंकाका के बारे में

लौकिक दृष्टि से परमपूज्य साई काकाजी के जीवन में रोमांचक, विस्मयकारक और नाटकीय ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता। उन्होंने स्वयं भी कभी अपने जीवन की लौकिक और पारमार्थिक घटना या अनुभवों का विशेष उल्लेख नहीं किया। इसी कारण, बचपन से ही उनमें रही आत्मज्ञान प्राप्ति की अनन्यसाधारण आस्था और उनकी सिद्धावस्था के बाद उनके संपर्क में आनेवाले अनेक के जीवन में आया हुआ यथार्थ, अलौकिक और आश्चर्यकारक परिवर्तन; इसी में ही उनके अद्भुत, शुद्ध, सरल, दिव्य, और पवित्र जीवन को देखा जा सकता है या देखना आवश्यक होता है।

किसी विशिष्ट परम्परा का आग्रह और निषेध नहीं। किसी भी परम्परा के सत्यनिष्ठ आदर्श तत्वों का सहज स्वीकार उनमें दिखाई देता है। आस्तिक हो या नास्तिक, पापी हो या पुण्यवान, सज्जन या दुर्जन इत्यादि अनेकानेक प्रकार के जीवों को उनके जीवन दर्शन में एक विशेष तरह का खुलापन, अपनापन, आंतरिक अपनत्व और आधार मिल जाता है। उनके संपर्क में आनेवाले अनेक की अंत:प्रेरणा अत्यंत सहजत: से आत्मपरिवर्तन के लिए तत्पर हो जाती है और अपार्थिव चेतना, नवोन्मेश से स्वानंद प्राप्ति के लिए व्याकुल हो उठती है, इसी में उनका दिव्यत्व प्रकट होता है। आत्मकल्याण के लिए चेतना के ऐसे असाधारण जागरण को परमार्थ मार्ग पर 'दीक्षा' के नाम से जाना जाता है। उनके द्वारा प्रदत्त 'दीक्षा' किसी विशेष औपचारिकता और विधि निषेध से दूर रही। दीक्षा को अनुकंपा के धागे में पिरो कर, अधिकारी और अनाधिकारी जैसे परंपरागत भेद से ऊपर उठकर, उन्होंने सब को आत्माविकास के लिए सहज जागृत और प्रवृत्त किया, जिसमें अनाधिकारी को अधिकारी बनने के लिए आवश्यक रास्ता खुला रखा और अधिकारी के लिए परमार्थ मार्ग अधिक प्रशस्त किया। इसलिये उनका परमार्थ लौकिक जगत से दूर और शुष्क नहीं रहा बल्कि उनके मातृवत्सल स्वभाव के कारण आत्माविकास के लिए अधिक सहायक, निर्लेप और शाश्वत महसूस होता रहा।

साईंकाका
साईंकाका

ज्ञानगंज से उन्हें प्राप्त हुई श्रीविद्या तन्त्रमार्गी होने पर भी, इस परमकरुणामयी विभूति ने उस तन्त्रविद्या की तांत्रिक औपचारिकता एवं उपासना को सदयस्थिति के अनुकूल बनाया, उसे मातृभाव में बांध लिया और अधिकांशत: लौकिक आसक्ति में लिप्त इस तंत्रदर्शन को उन्होंने आत्मदर्शन के तरफ मोड़ दिया। इतना ही नहीं तो श्रीविद्या के मातृस्वरूपी उपासना से प्रकट होने वाले प्रेमविश्व का बीज उन्होंने उनके सम्पर्क में आनेवालों के अन्तःकरण में बोया, अंकुरित किया, वृद्धिंगत किया और जीवन का अविभाज्य अंग बनाया। यह अनुभूति उनके जीवन को अधिक सूक्ष्मता से देखने पर ये ज्ञात होती है।

हे विश्वची माझे घर। ऐसी मती जेयाची स्थिर। किंबहुना चराचर। आपणचि झाला। ...... संपूर्ण सृष्टि में मैं ही व्याप्त हूँ ऐसा जिसका अनुभव होता है, उस के लिये पूरा विश्व ही अपना घर होता है।

जीव के सर्वव्यापी होने की, विश्वव्यापक प्रज्ञा की, परमोच्च उत्कट अवस्था और अनुभूति संत श्रीज्ञानेश्वर माऊली ने इस पद में व्यक्त की है। यह अनुभूति उनके जीवन में सभी स्तर पर प्रकट हुई दिखाई देती है।

उनका कोई मठ या आश्रम नहीं, एक जगह वो कभी रहे नहीं, बल्कि साधकों के हृदय का आश्रय लेकर, जो भी सहजता से उपलब्ध हुआ उसी में यह विश्वंभर रहा और अनेक साधकों को अपने अपने घरों में आदर्श आश्रम जीवन कैसे जीयें, इसका परिचय अपने स्वयं के जीवन उदाहरण से देकर, उन्होंने उनके जीवन प्रांगण में दिव्य उजाला भर दिया।

उनको कभी उनके साधक जीवन या आध्यात्मिक अनुभव के बारे में पूछा, तो जवाब में उन्होंने हर समय अपने गुरुदेव परमपूज्य स्वामी मुक्तानंद परमहंस द्वारा लिखित आध्यात्मिक चरित्र 'चित्शक्ति विलास' ग्रंथ का अध्ययन करने के लिए कहा। उन्होंने यह भी बताया की 'इस आध्यात्मिक चरित्र ग्रंथ में व्यक्त किए गए अनुभवों के अलावा कहने के लिए और कुछ अलग होता नहीं है। हर एक साधक के जीवन में आने वाले आध्यात्मिक अनुभव कम ज्यादा स्तर पर वैसे ही होते हैं। लेकिन फिर भी वह उसके लिए विशिष्ट और अनूठे होते हैं। साधकों को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि व्यक्ति से ज्यादा तत्व की महती होती है इसलिए यह अच्छा होगा की आप अपना अनुभव स्वयं करें।'

अपनी स्वयं कि साधना का उन्होंने कभी भी उत्कट प्रकटीकरण नहीं किया। वह जानबूझ कर उसे टाल देते थे। जिसको मार्गदर्शन के लिए उस समय जितना आवश्यक है, उतना उन्होंने बताया और अपने अनुभवों का प्रभाव साधक के चित्त पर होने नहीं दिया। हर एक को अपने-अपने आत्म-अनुभव के लिए अंदर बाहर से बिल्कुल खुला छोड़ा और इतना ही नहीं तो, हर एक को उसका साधन-प्रवास उसके अपने विवेक के प्रकाश में चलना सिखाया और परमार्थ मार्ग सहज कर दिया।

पानी जैसे निसर्ग में जल, घन अथवा वायु ऐसे सभी अवस्था में विचरण करता है; उसका कोई विशिष्ट आकार, गन्ध, स्वाद और स्पर्श नहीं होता, फिर भी वह जीवनदायी और पोषक होता है। इतना ही नहीं वह निर्मल और पवित्र भी करता है, वैसे ही उनका जीवन हम सभी ने अनुभव किया यह हमारा परमभाग्य है। अत्यंत सहज अवस्था में रहकर, किसी भी अभिनिवेश के सिवाय, अनेक के अंतरंग में व्याप्त हो कर, उन्हें अपने सुख-स्वरूप का ध्यास लगाकर, उसे प्राप्त करा देनेवाले विलक्षण महापुरुष का ये अद्भुत जीवन दर्शन है।

आगे पढ़ें

गुरु परंपरा

नित्यानंद से आगे — समयरेखा के रूप में।

गुरु दर्शन

चित्र और वीडियो — सत्संग की झलक।

गुरु तत्त्व

मूल विषयों में से एक — संक्षिप्त पाठ।