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शब्द, जो मार्ग में मिलेंगे

ज्ञान-साधना शब्दावली

अंग्रेज़ी अक्षरों में भी खोज सकते हैं — जैसे "shraddha" या "guru"

अकाल-पद
कालातीत अवस्था
अकृत्रिम
प्राकृतिक
अक्ष्क्षुण
जिसका क्षरण (क्षय) ना हो
अगम्य
जहाँ पहुँचना सम्भव ना हो
अचिन्त्य
जिसका चिन्तन करना भी सम्भव नहीं
अद्वैत
दो नहीं — जीव और ब्रह्म की एकता का दर्शन।
अधिदेवता
अधिदेव, कुलदेवता; ग्रामदेवता; अध्यक्ष या (रक्षक) देवता; कई प्रकार के आधिदेव होते हैं-जैसे कुल का गाँव का अधिदेव- ज्ञान की अधिदेवता-सरस्वती हैं।
अधोमुखी
नीचे की ओर
अनन्य-भक्ति
पूर्ण समर्पण से ईश्वर भक्ति
अनवरत
निरन्तर
अनुकम्पा
असीम कृपा
अनुग्रह
शक्तिपात; अनेकत्व में एकत्व का अनुभव प्रदान करानेवाली मोक्षकारी शक्ति
अनुपम
अद्भुत; उपमा रहित
अनुभवगम्य
जिसका केवल अनुभव किया जा सके
अन्तर्मुख
जिसका मुँह अन्दर की ओर हो, अन्दर की ओर प्रवृत्त
अन्तिम-लक्ष्य
प्रत्येक प्राणी का परम लक्ष्य, आत्मसाक्षात्कार
अपरिष्कृत
जिसका परिष्करण या संस्कार न हुआ हो, असंस्कृत, जो ठीक या साफ न किया गया हो, मैला कुचैला, अनगढ़, बेडौल
अपरिष्कृत चैतन्य
चैतन्य जब संस्कार ग्रहण कर लेता है तब जीव-रूप हो जाता है।
अपरोक्ष
प्रत्यक्ष; अपर अक्ष यानि नेत्रों के सामने; इन्द्रिय गम्य
अपेक्षा
आत्मज्ञान के अभाव में अज्ञान से उत्पन्न, मन में अशांति, भ्रम आदि कष्ट
अप्रमेय
जिसे पूरी तरह ना समझा जा सके
अप्राप्त
पदार्थ जो प्राप्त न हुआ हो; वह वस्तु या व्यक्ति या तत्व जो अभी तक प्राप्त न किया हो
अबोध्य
समझ के परे; जिसका बोध होना सम्भव नहीं
अर्धाङ्गिनी
पत्नि, भार्या
अवगत
जानकारी होना, ज्ञात होना
अवरोही क्रम
घटता क्रम (जैसे १०, ९, ८,....१)
अविद्या
अज्ञानता
अहेतुकी
किसी कारण (अपेक्षा) के बिना की गई कृपा या प्रेम
आंतरयात्रा
बाहर से भीतर की ओर — स्वयं की खोज की यात्रा।
आगम शास्त्र
जिन शास्त्रों मे गुरु शिष्य को ज्ञान की प्राप्ति की वैज्ञानिक विधि प्रदान करते हैं; जैसे तन्त्र-शास्त्र
आग्रह
विनती
आत्यन्तिक
अत्यन्त या चरम सीमा तक पहुँचा हुआ
आधिदैविक
सूक्ष्म (देव) स्तर का
आधिदैविक ताप
अलौकिक (दैविक) कारण से उत्पन्न दुःख- जैसे भूकम्प, बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि आदि
आधिपत्य
किसी वस्तु या व्यक्ति पर स्वामित्व रखने का भाव
आधिभौतिक
भौतिक पदार्थों और जीव जन्तुओं आदि के कारण या उसके द्वारा उत्पन्न होनेवाला
आधिभौतिक ताप
भौतिक पदार्थ या जीव जन्तुओं से होनेवाले कष्ट
आध्यात्मिक
कारण (आत्म) स्तर का
आप्तकाम
आत्मस्वरूप से ही प्राप्त आनन्द द्वारा पूर्णरूपेण तृप्त
आप्लावित
अच्छी तरह डूबा या डुबाया हुआ
आयुध
अस्त्र-शस्त्र
आराध्या
जिसकी आराधना की जाती हो, पूजनीय
आरोही क्रम
बढ़ता हुआ क्रम (जैसे १, २, ३,....)
आलम्बन
सहारा
आवरण
पर्दा
आवाहन
पूजन के समय मन्त्र द्वारा किसी देवता को आमन्त्रित करना
इच्छा
अपनी तृप्ति या सन्तोष के लिए किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति मन में होनेवाली चाह
ईक्षण
साक्षी भाव
ईश्वर
भगवान शिव
उत्पत्ति
जन्म लेकर इस पृथ्वी पर आने की क्रिया या भाव; जन्म लेना या पैदा करना
उपादान-कारण
कच्चा माल, जैसे घड़े का उपादान कारण मिट्टी है
उपार्जन
उद्योग या प्रयत्नपूर्वक लाभ कमाना, अर्जन
उभयलिङ्गी
जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों लिङ्ग हों
ऊर्ध्वमुखी
ऊपर की ओर
ऋणानुबन्ध
पूर्व जन्मों के कर्ज़ से बना सम्बन्ध
ककार
कटाक्ष
विशेषतः कुछ तिरछी नजर से देखने की क्रिया या भाव
कदम्ब
कल्पवृक्ष का एक रूप
कमनीय
अत्यन्त सुन्दर
कर्म
कार्य
कर्मेन्द्रियाँ
कर्म करने की इन्द्रियाँ जैसे हाथ, पैर, जननेन्द्रिय, गुदा, जीभ
कलिदोष
कलियुग के कलह आदि दोष
कल्पवृक्ष
ऐसा दिव्य शक्तियोंवाला वृक्ष जिसके किसी भी भाग को हाथ लगाकर मन में इच्छा करें तो तुरन्त फलित होती है।
कल्मष
पाप
कल्याण
मङ्गल होना, आध्यात्मिक विकास के लिए की गई शुभ भावना या आशीर्वाद
कवच
ऐसा आवरण जो बाहरी आघात से रक्षा करने के लिए हो
कषाय
सब प्रकार के दूषित मनोविकार
कामेश्वरी
कामदेव से पूजित
कुसुम
पुष्प
कृतज्ञता
किसी के द्वारा किए गए उपकार के प्रति हार्दिक धन्यवाद का भाव
कैवल्य मुक्ति
परमात्मा में आत्मा की लीनता
क्रियमाण
सक्रिय, वर्तमान में किये जानेवाले कर्म
गुरु
जो शिष्य के भीतर सोई हुई जागृति को जगाए; तत्त्व है, केवल व्यक्ति नहीं।
गुरु-तत्व
जीव को मुक्ति प्रदान करने के लिए परमात्मा की परम-करुणामय ज्ञानस्वरूप अवस्था
गुरुत्व-भाव
शिष्य के जिज्ञासा करने पर श्रीगुरु में कल्याण भाव का प्राकट्य
घनीभूत
जो गाढ़ा होकर या जमकर घना हो गया हो, प्रगाढ़
चिति
चैतन्य शक्ति
चित्
चैतन्य
चैतन्य
शुद्ध चेतना; सबके भीतर साक्षी रूप से विद्यमान जागृत सत्ता।
जगत्
चराचर सृष्टि
जननी
माता
जीव
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्था में रहनेवाला चैतन्य, जो स्वरूपतः तो शिव ही है।
जीवन्मुक्त
इच्छा-मात्र से मुक्त पुरुष
ज्ञान
अध्यात्म अर्थात् परमात्मा तथा आत्मा से सम्बम्ध रखनेवाला ज्ञान
तन्वाङ्गी
कोमल अङ्गोंवाली स्त्री
तुरीय
मोक्ष-अवस्था; जीव की चार अवस्थाओं (जागृत-स्वप्न-सुषुप्ति और तुरीया) में से अन्तिम अवस्था, जिसमें जीवभाव ब्रह्म में लीन हो जाता है
तुरीयातीत
वह शुद्धतम् निर्गुण-निराकार अवस्था जिसमें माता त्रिपुरसुन्दरी वास करती हैं।
त्रिगुण
प्रकृति के तीन गुण (सत्, रज, तम)
त्रिगुणातीत
गुणों से परे
दाडिम
अनार
दीक्षा
गुरु द्वारा शिष्य की जाग्रत शक्ति के जागरण का आरंभ।
देशकाल परिस्थिति
सगुण अवस्था
दैदीप्यमान
दमकता हुआ
द्योतक
अभिव्यक्त या व्यक्त करनेवाला
ध्यान
मन का एकाग्र, साक्षी अवस्था में ठहरना; श्वास के सहज अवलोकन से गहराने वाला अभ्यास।
नतमस्तक
श्रद्धा पूर्वक मस्तक झुकाकर प्रणाम करना
नश्वर
जो सदा बना न रह सकता हो, परिवर्तनशील
निगम शास्त्र
वेद, उपनिषद
निग्रह
नियन्त्रण, संयम
नित्य
शाश्वत, अपरिवर्तनशील
नित्य-मुक्त
जो सदैव आत्म स्वरूप में ही रहते हों
नित्य-वर्तमान
शाश्वत सत्य, कालातीत अवस्था, आत्मस्वरूप, पूर्ण जागरूकता
निमग्न
कार्य या विचार आदि में पूर्ण रूप से तन्मय; तल्लीन
निमित्त
वह व्यक्ति, जो नाम-मात्र के लिए कोई काम कर रहा हो, जबकि वह कार्य करवाने या प्रेरणाशक्ति देनेवाला और कोई होता है
निरपेक्ष
पूर्ण तटस्थत या निष्पक्ष
निरर्थक
पद या शब्द जिसका कोई अर्थ न हो, अर्थरहित
निराकार
आकार रहित, परमात्मा के सृष्टि सङ्कल्प से पूर्व अवस्था
निर्गुण
सत्, रज और तम इन तीनों प्रकार के गुणों से रहित (परे), त्रिगुणातीत; परमात्मा की सृष्टि सङ्कल्प से पूर्व अवस्था
निर्लेप
दोष आदि से रहित, जिस पर किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता हो।
निर्विकल्प
समाधि की अवस्था जब आत्मा पूर्ण प्रकाशित होती है इसमें आत्मा के अलावा अन्य कुछ भी नहीं होता, केवल स्वयम् का ही 'होना' है।
निर्विकार
जिसमें विकार न हो या न होता हो, अविकारी
नेति-नेति
असत्य को नकार कर सत्य समझने की प्रक्रिया, यह भी नहीं - वह भी नहीं
पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ
विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) बोध के साधन; कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक
पञ्च तन्मात्रा
ज्ञानेन्द्रियों के विषय को तन्मात्रा कहते हैं जैसे आँख का विषय रूप, नाक का गन्ध, त्वचा का स्पर्श, कान का शब्द, और जीभ का रस है
पञ्चकृत्य
भगवान शिव के पाँच कृत्य हैं - सृष्टि का उत्पत्ति, स्थिति, लय, शक्ति का निग्रह और अनुग्रह
पञ्चमहाभूत
सृष्टि हेतु शक्ति घनीभूत होकर आकाश के रूप में व्यक्त होती है। फिर आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति होती है।
पर-निर्भरता
दूसरे पर आश्रित होना
परंपरा
गुरु-शिष्य क्रम से चली आती ज्ञान की अखंड धारा।
परम-लक्ष्य
आत्म साक्षात्कार द्वारा मुक्त अवस्था प्राप्त करना
परम-सत्ता
निर्गुण-निराकार परमतत्व
परा-ज्ञान
भक्ति द्वारा इष्ट के दर्शन के पश्चात उनके स्वरूप का तत्वतः ज्ञान होना
परा-भक्ति
आत्मज्ञान होने के बाद आत्मा (इष्ट) के प्रति अथाह प्रेम
परा-वाणी
अभिव्यक्त होने के लिए अव्यक्त शक्ति का प्रथम स्पन्द् जोकि मूलाधार में होता है, इसके पश्चात यह वाणी भाव में, भाव से विचार में और विचार से बोली में प्रकट होती है।
पराकाष्ठा
चरमोत्कर्ष पर, ऊर्ध्व बिन्दु, अन्तिम अवस्था
परिकल्पना
जिस बात की बहुत कुछ सम्भावना हो और उसे पहले ही मान लेना या उसके नाम, रूप आदि की कल्पना कर लेना
परिमल
सुगन्ध
परिष्कृत चेतना
संस्कार जब क्षय हो जाते हैं तब शुद्ध चैतन्य ही रह जाता है
पश्यन्ति-वाणी
भाव में अभिव्यक्त वाणी
प्रज्ञा
विवेक-युक्त बुद्धि की उच्चतम अवस्था
प्रणव
ॐकार, बीज, ओंकार मन्त्र
प्रतिष्ठित
अच्छी तरह से स्थापित किया हुआ, प्रमुख
प्रभा
तेजोमण्डल
प्रवृत्त करना
किसी को कार्य करने में लगाना
प्रसव
उत्पन्न करना, अस्तित्व में लाना
प्राकृत
स्वाभाविक
प्राणिक क्रिया
पाँच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान), और पाँच उप प्राण (देवदत्त, कृक्कल, धनञ्जय, नाग, कूर्म) के द्वारा शरीर में की जानेवाली क्रिया।
प्रादुर्भाव
अवतरण, प्रकटन
प्राप्त की प्राप्ति
आत्मस्वरूप ही सदैव प्राप्त है, जो कभी अप्राप्त हुआ ही नहीं, केवल विम्मृत हो सकता है, उसका पुनः स्मरण (प्रत्यभिज्ञा) ही प्राप्त की प्राप्ति है।
प्राभव
प्रभुता, प्रभुत्व
प्रारब्ध
क़िस्मत, भाग्य जो पूर्व जन्म में किए गए उन कर्मों का समूह है जो परिपक्व होकर फल देने के लिए निश्चित रूप से तत्पर हैं।
बहिर्मुख
वृत्तियों का संसार की ओर प्रवाह
बीज
मूल, जिससे किसी भी तत्व, रूप आदि की उत्पत्ति हो
बीजाक्षर
मन्त्र का पहला अक्षर, तन्त्रशास्त्र में किसी देवता के उद्देश्य से निश्चित किया हुआ मूल मन्त्र
बौद्धिक
बुद्धि की क्रिया द्वारा
ब्रह्माण्ड
असंख्य आकाशगङ्गाओं को अपने अन्दर रखनेवाला अनन्त विस्तार
मणिद्वीप
माता त्रिपुरसुन्दरी का लोक
मणिपुर चक्र
अग्नि-तत्व को नियन्त्रित करनेवाला केन्द्र (चक्र) जो नाभि के समानान्तर सुषुम्ना में स्थित है।
मदन
कामदेव
मरणधर्मा
मृत्यु का नियम, नश्वर, जिसकी मृत्यु अवश्य होती है
मर्यादा
मान धर्म, परोपकार की भावना से अपनी स्वतन्त्रता पर संयम रखना
मलिन-तत्व
अज्ञान, भ्रम, मोह
महाभूत
सत-रज-तम गुणों से उत्पन्न होनेवाले वे तत्व (भूत) जिनसे तात्विक (भौतिक) सृष्टि का निर्माण होता है। जैसे आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी
मातृका
अ से अः तक १६ स्वर तथा क से क्ष तक ३६ व्यञ्जनों की वर्णमाला
मातृत्व
ममता, माता का अपनी सन्तान के प्रति स्वाभाविक प्रेम
विचार
चेतना के स्तर पर उठने वाली तरंग; जितनी गहराई से आता है, उतना ही बलवान होता है।
विलास
माया, चैतन्य का खेल
विशुद्ध
मौलिक, शुद्धतम
वृत्ति
मन-बुद्धि में उठने वाली तरंग; बहिर्मुखी हो तो बाधक, अंतर्मुखी हो तो साधक।
वैखरी
मुँह से उच्चरित होनेवाला शब्द
शक्ति
भीतर की चेतन ऊर्जा; साधना और दीक्षा से जाग्रत होने वाली सामर्थ्य।
शक्तिपरक
शक्ति पर आधारित
शिवपरक
शिव पर आधारित
शिशुवत
बच्चे की तरह
शुद्ध-सत्व
परम शुद्ध ज्ञान
श्रद्धा
हृदय की वह स्थिरता जो किसी के भाव में अपने अभाव को पहचानकर, उसे भरने की तत्परता जगाए।
श्वेत वर्ण
सफेद रङ्ग
षडैश्वर्य
ज्ञान, वैराग्य, श्री, यश, शौर्य, वीर्य
षड्-रिपु
(काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) ये छः शत्रु हैं
षोडशा
सोलहवीं
संशय
सन्देह, आशङ्का, दुविधा
सकारात्मक
सहमति या स्वीकृति का भाव
सगुण
गुणों के सहित, लक्षणयुक्त
सच्चिदानन्द
सत्, चित् और आनन्द से युक्त परमात्मा का एक नाम
सत्-चिन्मय-नीलिमा
महाकारण शरीर, नील बिन्दु
सद-असद
सत्य-असत्य, विद्या-अविद्या
समग्रता
पूर्णतः
समदृष्टि
सबको एक समान देखना
समन्वय
परस्पर निर्वाह
सविकल्प
आत्म-साक्षात्कार से पूर्व समाधि का एक प्रकार
साक्षी
देखने वाला — विचारों और दृश्यों के पीछे का अचल द्रष्टा।
साधना
नियमित आंतरिक अभ्यास; चित्त-शुद्धि के लिए मार्ग पर प्रतिदिन का चलना।
सापेक्ष
संलग्न, अपेक्षा रखनेवाला, दूसरे की अपेक्षा से होनेवाला
सामरस्य भाव
वह अवस्था जिसमें सत्-रज्-तम् तीनों गुण बराबर हों।
स्तुति
स्तोत्र, प्रशंसा गायन
स्थितप्रज्ञ
स्थिरचित्त, स्थिरबुद्धि, स्थिरमना
स्पन्दन
कम्पन
स्वयम्भू
अपने आप मे स्थित
स्वाधिष्ठान चक्र
जल-तत्व को नियन्त्रित करनेवाला केन्द्र जो लिंग के समानान्तर सुषुम्ना में स्थित है।
स्वाध्याय
स्वयं का अध्ययन; शास्त्र-पाठ के साथ आत्म-निरीक्षण।
हलाहल
विष
कोई शब्द नहीं मिला — कुछ और खोजें।