प्रश्नोत्तर
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कृपा शब्द अपने मौलिक में 'कृ' धातु से बना है। कृपा का अर्थ करके पाना। जो करता है, वही पाता है। साधना रूपी क्रिया का जो फल है, वही कृपा है। गुरु कृपा नहीं करता, गुरु साधना के लिए प्रेरित करता है। साधना के परिणाम स्वरूप जो प्राप्ति होती है, वह है कृपा।
हमारे गुरुदेव बाबा स्वामी कहते थे — उसको प्यार के साथ भोग को खत्म करो। बबूल भी बोया है तो हमने ही बोया था; अब उसके काँटे ऐसे निकालो कि न वह अपने पैर में चुभे, न किसी राहगीर को चुभे। इन काँटों का अच्छा उपयोग घर के ईंधन के रूप में कर लो — बस दृष्टि की बात है, नज़र बदल दो तो नज़ारे बदल जाते हैं।
सांस होकर सांस को अनुभव करना ही हमारे ध्यान का सूत्र है। सांस नियंत्रित होती है तो प्राण एकाग्र होना शुरू होता है और प्राण के साथ ही मन एकाग्र होता है। इस एकाग्रता में अंतर्मुखता के कारण सात्विकता उभरती है, शांति अवतरित होती है, मौन में रसानुभूति होती है, दिव्य प्रेम का उदय होता है।
मन का स्वभाव चंचल है; उसका शांत होना, स्थिर होना ध्यान है, मनातीत होना समाधि है।
साधना का उद्देश्य ही चित्त को शुद्ध करना है। अगले संस्कार निर्मित न हों और संचित संस्कार नष्ट हों — संस्कार ही संसार है, संस्कार का क्षीण होना ही साधना है।
हम जो पूजा करते हैं यह अपरा पूजा है, स्थूल पूजा है, प्रतीकोपासना है। परा पूजा में यह शरीर ही श्री चक्र हो जाता है। वास्तव में साधना का लक्ष्य ही है स्थूल से सूक्ष्म की ओर गति, अपरा से परा की ओर उत्थान।
श्रद्धा का मतलब है कि किसी के भाव को देखकर आपको अपने अभाव का पता चल जाए तो आप उस अभाव को भाव से भरने का प्रयास शुरू कर दें। जो व्यक्ति सम्मान और प्रशंसा तो करता है, पर स्वयं में वह गुण विकसित करने का प्रयास नहीं करता — ऐसे लोग सबसे बड़े भक्त दिखते हैं, पर उनकी श्रद्धा मिथ्या-श्रद्धा है, श्रद्धा नहीं।
गुरु गलत हो तो हो, लेकिन श्रद्धा गलत न हो। प्राप्ति तो होगी ही, क्योंकि श्रद्धा से प्राप्ति होती है, गुरु तो सिर्फ निमित्त बनता है।
विचारों से डरिए मत, इनका उठना एकदम स्वाभाविक है। विचार आपको कोई बाधा नहीं दे रहे, वे तो आपके ज्ञान के सहचर हैं। अपनी श्वास-प्रश्वास को सावधानीपूर्वक अवलोकन करते हुए, प्राण को महसूस करते हुए अपनी गहराई में जाइए।
क्या हम कर्ता हैं? हम कर्ता नहीं हैं। जो सत्ता आपके शरीर को माध्यम बनाकर आपको संचालित कर रही है, वह कर्ता है। सब ईश्वर-शक्ति के अधीन है — इसका अनुभव हो तो कर्ता-भाव नहीं रहता।
संसार बिगड़ा नहीं, बिगड़ी हमारी दृष्टि। जब तक वह सही नहीं होती, संसार बिगड़ा नजर आएगा। सही नेत्र विशेषज्ञ की जरूरत है, जो बिगड़ी आँख का नंबर सही कर दे।
पूजा का मतलब है, अपने आदर्श के साँचे में पूरी तरह ढल जाना, वही हो जाना। सिर्फ आरती करना, अगरबत्ती जलाना, मंदिर जाना, तिलक लगाना, फूल चढ़ाना — यही पूजा नहीं है। पूजा यानी अपने इष्ट को आत्मसात कर लेना; आप और आपका इष्ट दो न रह जाएँ, एक हो जाएँ।
आश्रम का मतलब ईंटों की दीवार और एक भवन नहीं होता। सत्य के खोजियों के समूह-स्थल को आश्रम कहते हैं। आश्रम के दो मतलब हैं — एक जहाँ श्रम करे, यानी साधना करे; आपके घर का वह कमरा भी आश्रम है, जिसमें आप साधना करते हैं। दूसरा मतलब है जहाँ आश्रय ले — और वास्तविक आश्रय अपने स्वरूप में ही मिलता है। घर को आश्रम बनाओ, आश्रम को घर मत बनाओ।
दीक्षा होने के बाद साधक जाग्रत शक्ति के अधीन हो जाता है। यदि आपमें जागरूकता है, आपके गुणों में सात्विकता है तो आप समझ पाएँगे कि जो भी हो रहा है, शक्ति कर रही है। शक्ति को शांत रखिए, वह ही संदेहों का निवारण भी कर देगी।
वृत्ति कभी अच्छी या बुरी नहीं होती। वृत्तियों के साथ जब मन और बुद्धि जुड़ जाती है तो अच्छा या बुरा बनना शुरू होता है। वृत्ति बहिर्मुखी है तो बाधक है, अंतर्मुखी है तो साधक है — पर वृत्तियों का प्रयोजन ही अंततः मोक्ष प्रदान करना है।
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