प्रारंभ

पाँच प्रश्न, जो हर खोजी पूछता है

किसी भी प्रश्न को स्पर्श करें — उत्तर वहीं खुल जाएगा।

अपनी सांस को सहजता से, प्रेम से देखना शुरू करिए, ध्यान अपने आप शुरू हो जाएगा। विचारों से उलझिए मत। धीरे-धीरे आपके ध्यान में गहराई आएगी — यही सहज और सरल उपाय है।

मन का स्वभाव चंचल है; उसका शांत होना, स्थिर होना ही ध्यान है। मन को शांत करने के उपाय ही उसे अशांत करते हैं — कुछ न करना ही इसे शांत करने का उपाय है। जो हो रहा है उसे महसूस करें, उसके प्रति जागरूक बने रहें; कुछ करने या सोचने का अपनी तरफ से प्रयास न करना ही एकमात्र उपाय है।

देहधारी गुरु का प्रयोजन बस इतना है कि वह आपके अंदर की गुरुता को जगा दे, आपको आपकी अचेतना से परिचय करा दे, आपको आपके खजाने की खबर दे दे। जिसके भी संग में आपको अपनी गुरुता का अहसास हो, समझ लें कि वह गुरु है। जिसके संग में हीनता का अहसास हो, वह गुरु नहीं है।

मन लगे न लगे, जी करे न करे, फिर भी थोड़ा ध्यान रोज करें, थोड़ा पाठ, जप, साधना रोज करें। यह थोड़ी-सी पूँजी ही आपके जीवन की असली कमाई है — एक दिन आपके जीवन का खजाना दिव्यता के हीरे-मोतियों से भर जाएगा।

बुद्ध के समय एक क्रूर डाकू था, अंगुलिमाल, जो हत्या करके उंगलियों की माला पहनता था। बुद्ध से भेंट होते ही उसमें ऐसी श्रद्धा जगी कि उसी दिन से उसने हिंसा त्याग दी। लोग कहते हैं यह बुद्ध का चमत्कार था — पर यह श्रद्धा का चमत्कार था। इस धरती पर कोई किसी को बदल नहीं सकता, यदि स्वयं बदलना न चाहे। श्रद्धा बदल सकती है।